बृन्दावन युवा नृत्यांगना के कडुवे अनुभव, हंपी, बेलूर और हळेबीडु का प्रवास कथन :

जब देव मंदिरों की शिलाबालिकाएँ धरा पर उतरकर नाचने लगीं!
द्वार पर हाथ जोडकर ओ यात्रिक अंदर आओ।
यह देव मंदिर सिर्फ शिला नहीं कला का जाल है।
घंटों का निनाद नहीं जागटा नहीं है।
कपूर की आरती की ज्योति नहीं।
भगवान के आनंद ने रूप लिया है यहाँ
रसिकता का सागर उमड आ रहा है यहाँ।
इस कविता की रचना सन् १९२८ ई.में सोमनाथपुर के देव मंदिर के बारे में कुवेंपु ने की थी। अन्य लोगों के आक्रमण से यह मंदिर भग्न होने के कारण वहाँ कोई पूजा नहीं होती, कोई पूजारी, पुरोहित भी नहीं है। घंटों का निनाद, जागटे का शब्द, कपूर की आरती भी नहीं है; फिर भी कुछ नष्ट हुआ हो ऐसे विषाद भाव को न अपनाकर अपने शिल्पकला वैभव में भगवान के आनंद का रूप वहाँ हो; समझकर राष्ट्रकवि कुवेंपु यात्रियों को बुलाते हैं-इस तरह जि.एस.शिवरुद्रप्पाजी लिखते हैं।
हमारी दृष्टी में कुवेंपु की यह पुकार सुनकर कोई एक प्रवासी जा सकता है पर न तो यात्री। जिन मंदिरों में पूजा नहीं होती है, वहाँ प्रवासी लोग जाते हैं, यात्री नहीं। यात्री ही अलग हैं, प्रवासी अलग। नाव में बैठकर विहार करनेवाले विदेशी प्रवासी को गंगा एक सुंदर नदी जैसे दीख पडती है। लेकिन “गंगा मैया की जय हो” कहते हुए नाव चलानेवाले गरीब भारतीय नाविक की आँखों में जैसे दिखायी पडती है वैसे उस विदेशी प्रवासी को नहीं दिखायी पडती है। प्रवासी को गंगानदी का पानी मलिन दीख सकता है। परंतु यात्री को पवित्र गंगाजल के रूप में दिखायी पडता है।
भक्ति संपन्न यात्री को गंगा हो, तुंगा हो, कावेरी हो, कृष्णा हो या और कोई नदि का पानी हो पवित्र गंगाजल होकर ही गोचरित होता है। कोई भी मृत्युशैया पर हो तो ‘शीघ्र गंगाजल लाओ’ कहते हैं। तब कोई काशी दौड जाकर गंगाजल नहीं लाता है। घर की गगरी में रहे पानी को ही ‘गंगाजल’ मानकर अंतिम साँस लेनेतक शीघ्र पिलाते हैं। इस से मरनेवाले को सद्गती मिलती है – इस तरह का गाढा विश्वास है।
पूजा होनेवाले मंदिर में बाह्य दृष्टी से शिल्पकला सौंदर्य न होने पर भी, अंतरंग में भक्तिभाव संपन्न रखे हुए लोग उस मंदिर में रही देवताओं की आराधना भक्तिभावना से करते हैं। उजडे हुए मंदिर के शिल्पकला वैभव को देखनेवाला प्रवासी नास्तिक होने पर भी ‘सत्यं-शिवं-सुन्दरं-इस तात्विक दृष्टी से यात्री भी हो सकता है। शिल्पी की करकुशलता से बनाये गये शिल्पकला के पीछे स्थित सत्य-शिव-सौंदर्य को आस्वाद कर सकता है।
प्रवासी प्रकृति के बाह्य सौंदर्य का उपासक है। यात्री इस प्रकृति के उस पार रहे सौंदर्य का उपासक है। बिना उजडे हुए मंदिर के शिल्पकला वैभव को देखकर आनंद लेनेवाला सौंदर्योंपासक प्रवासी है। इसका मतलब यह नहीं है कि भक्तिसंपन्न हुआ यात्री ऐसे उजडे हुए मंदिर में जाकर वहाँ की शिल्पकाला वैभव का आनंद नहीं लेता है। तब वह यात्री नहीं होता है, प्रवासी रहता है। जब वहाँ जाता है, तब उसको भक्ति उमड आने के बदले वहाँ के भग्नावशेषों को देखकर बीते दिनों में घटी मतीय संघर्षों को यादकर खेद और आक्रोश उमड पडता है।
प्राचीन काल में मशहूर मंदिरों के नवरंग मंटप में चल रहे नृत्य भगवान की पूजा का एक भाग ही था। वह लोगों के मनोरंजन के लिए संपन्न होने का कर्यक्रम नहीं था। बेलूर चन्नकेशव के मंदिर में होयसळ राजा विष्णुवर्धन की रानी शान्तला नाट्यरानी बनकर जो नृत्य करती थी वह भगवान की सेवा ही थी। शिल्पकला वैभव से शोभायमान रहे, बिना पूजा के सोमनाथपुर मंदिर हो, घंटा, जागटों के निनाद में पूजा होनेवाले हंपि, हळेबीडु, बेलूरु आदि देवालयों को संदर्शन करनेवालों में सिर्फ यात्री और प्रवासी के अलावा कलाकार भी होते हैं। ऐसे कलाकारों को पुरातत्व(Archaeology) विभाग के कानून ‘कला का फंदा ना होकर उनकी कला को ही फँसानेवाला हो गया है। ऐसी एक विषादनीय घटना पिछले हफ्ते मथुरा – वृंदावन से हमारे मठ में आयी एक युवा कलाकार ने आक्रोश, आवेश एवं दुःखी होकर निवेदेन किया।
ओडिस्सी नृत्य में पारंगत हुई उस युवा कलाकार का नाम विष्णुप्रिया गोस्वामी है। जब हम बनारस हिन्दू विश्वविद्यालाय के संस्कृत विभाग में स्नातकोत्तर उपाधि पूरा कर डक्टरेट उपाधि पाने केलिए संशोधन करने लगे थे(१९६७-७६) तब हमारे बगल के दर्शनशास्त्र विभाग के संशोधन में लगे हुए हमारे अभिन्न मित्र श्रीवत्स गोस्वामी थे। वे अब वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु संप्रदाय के आचार्य बने हुए हैं। वैष्णव संप्रदाय के प्रकार गृहस्थ हुए उनकी पोती विष्णुप्रिया है। बाल्य से ही उसके प्रभुत्व अभिनय को हम ध्यान देते आये थे। जब पिछले हफ्ते सिरिगेरे में हुए हमारे मठ के वार्षिक समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने हेतु मठ के आह्वान को मानकर, तब अपने पिता राजु गोस्वामी, माता शिल्पी गोस्वामी और बहन जयन्ति गोस्वामी के साथ वृंदावन से सिरिगेरे आयी थीं। तरळबाळु पूर्णिमा महोत्सव की चाँदिनी में शिवजी के विषय में ‘अष्ठशंभु’-नामक प्रसिद्ध ओडिस्सी नृत्य को प्रस्तुत करके हजारों भक्तादियों की प्रशंसा पा चुकी।
लिंक (https://math.taralabalu.in/news.php?tp=650)
दूसरे दिन इस युवा कलाकार को उनके मात-पिता के साथ विश्वविख्यात हंपि, बेलूर और हळेबीडु मंदिरों का दर्शन करने भेजे थे, तब हुए कडुवे अनुभवों को शाम को वैयक्तिक रूप से निवेदन कर लिया। बाद में वृंदावन लौटने के बाद वहाँ घटित घटनाओं को सुदीर्घ E-Mail द्वारा वर्णित किया है।
उसका सार इस प्रकार है - १७ फरवरी गुरुवार (वह मेरा जन्म दिन भी था) जब हम हंपि के विठल मंदिर पहुँचे तब दोपहर की कडी धूप थी। मैं और मेरी बहन जयंति देखने में बहुत गोरे होने के कारण वहाँ रहे सब लोग घूरकर देखने लगे। वहाँ के चौकीदार ने “क्या हम विदेशी हैं या भारतीय” – इसे जानने के लिये हमारे आधार पत्रों को पूछा। यह बात हमें नयी नहीं थी। पुरि के जगन्नाथ मंदिर में कभी-कभी हम जाते थे, तब हमें मंदिर के मुख्य द्वार पर ही रोककर इस तरह की जाँच की जाती थी। हम अपने पहचान पत्रों को दिखाकर आगे चले। बाद में कुछ क्षणों के बाद पुलिस ने आकर मुझे रोक दिया। जो पोषाक मैंने पहनी थी, वह कानून बाहिर कहकर आक्षेप करने लगा। उस दिन जो पोशाक मैंने पहनी थी ओडिस्सा की आम युवतियाँ जो धारण करती थीं, वैसी साधारण साडी, चाँदी की चूड़ियाँ थीं न ही ओडिस्सा के नृत्य की पोषाक। इस में क्या गलती है? इस तरह प्रश्न करने पर वाद विवादों के बाद पुलिस ने हमें आगे जाने दिया।
मंदिर के पच्चीकारी का काम और नाट्य के विभिन्न ढ़ंग में रहीं शिलाबालिकाओं को देखकर नर्तकी होने के कारण उसी तरह जब मैं खडी हुई तब मेरे पिताजी ने फोटो लिये। तुरंत चौकीदार सीटि बजाते हुए दौडकर आया और जोर-जोर से बातें करते हुए फोटों को मिटाने के लिए जबरदस्ती करने लगा। उसके लिए क्या कारण है? पूछने पर ‘यहाँ विवाह पूर्व के भावचित्र नहीं लेना चाहिए’ – इस तरह कहने लगा। “जो साडी मैनें पहनी थी वह साधारण थी, दोपहर की कडी धूप में मुँह पर पसीने आ रहे थे। सिर पर बाल बिखरे हुऐ थे। तब यह विवाह पूर्व का चित्र कैसे हो सकता है? तो मेरे साथ आये वर कौन है और कहाँ है? दिखा दो” कहकर मैंने जोर किया। मेरे पिताजी ने भावचित्रों को मिटाने से मना किया। वहाँ के चौकीदार और झाडू लगानेवाले नौकर मिलकर कन्नड भाषा में हमारे बारे में कई तरह की बातें करते हुए हम लोगों को अंतराष्ट्रीय भयोत्पादक जैसे घूरने लगे।
बाद में वे सब मुझको और मेरी माता को घेरकर प्रश्न करने लगे। मैंने सिरिगेरे मठ में कल रात चले तरळबाळु पूर्णिमा महोत्सव में ओडिस्सी नृत्य का अभिनय किया था, तब मेरे पैरों को लगाया हुआ अल्ता को मैंने नहीं निकाला था, इस तरह जवाब देने के बाद दस मिनिटों तक चर्चा करने के उपरांत मैं एक युवा नर्तकी मान ली गई। फिर भी “नृत्य शैली में फोटो नहीं खींचना है, सिर्फ मुस्कुराते खडे होकर खिंचवा सकते हैं” –इस तरह का आदेशा दिया। इस तरह पुलिसवालों ने हमें तकलीफ देते वक्त वहाँ उपस्थित लोग हमने कोई घोर अपराध किया हो, इस तरह देख रहे थे। इससे ऊबकर मैं विठल मंदिर से निकलकर बाद में हंपी के रहे अन्य स्थानों को देखने के लिये मुझमें कोई उत्साह नहीं रहा।
दूसरे दिन आपके मठ की शिष्या भरतनाट्य की मेरी सहेली पृथ्वी के साथ बेलूरु, हळेबीडु मंदिरों को देखने जब आपने भेजा, वहाँ पर भी यही हालत थी। पुलिस की आँखों से बचाकर फोटो खिंचवाते वक्त हमारे मन में चोरी करने जैसी अपराध प्रज्ञा हम लोगों को सता रही थी। कोणार्क और मुक्तेशवर देव मंदिरों में इस तरह का कोई निर्बंध नहीं है। ‘बेलूर मंदिर की शिलाबालिकाओं के नीचे खडे होकर उसी ढ़ंग से फोटो खिंचवालो’ – आपकी सूचना का पालन अंत तक नहीं हो सका’ – इस तरह की विषाद छाया मुझे घेर चुकी है। कोविड के कारण से पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने बहुत निर्बंध किया है- इस तरह पृथ्वी ने कहा । लेकिन जैसे आपका आदेश हुआ था, वैसे शिलाबालिकाओं के नीचे खडे होकर उसी ढ़ंग में यदि मैं फोटो खिंचवा लेती तो क्या कोविड वौराणु फैलता था?”
अभी अभी मुंबई की IIT संस्था में अंतराष्ट्रीय स्तर पर Mood Indigo Classical Dance Competition का आयोजन हुआ था। उसमें प्रथम स्थान पायी हुई युवा ओडिस्सी नर्तकी विष्णुप्रिया का प्रश्न है- “When I visited these temples, I was just wearing a simple Saari trying to bring life to the cultural spirit to the temple architecture. How am I violating the sensitivity of the temple?”
श्री तरळबाळु जगद्गुरु
डा. शिवमूर्ति शिवाचार्य महास्वामीजी,
सिरिगेरे
विजय कर्नाटक, दैनिक, बेंग्लूरु
दिनांक:२४-२-२०२२